Tuesday, March 21, 2017

पात्रामध्ये नदीच्या प्रेते सडूनी गेली ...

आज आमच्या कवितेच्या ग्रुपवर स्वाम्याच्या मस्करीला उत्तर देताना कौतुकने हां शेर लिहीला होता.

माझ्या खरेपणाची देऊ कशी मी ग्वाही
मसणातल्या मढ्यानो बोलाल का हो काही ?

त्यातल्या प्रश्नाचा संदर्भ घेवून सुचलेल्या काही ओळी !

रस्त्यास त्या बिचाऱ्या सांगाल काय काही ?
पथभ्रष्ट भास्कराला शिकवाल काय काही ?

सगळे खरेच आहे खोटे न येथ कोणी,
रचल्या चितेस सांगा बोलाल काय काही ?

'योगी' कितीक झाले, होतील लाख मुल्ला
ऐन्यास  बोल थोडा लावाल काय काही ?

झोळी गळ्यात बांधुन दारात वाट पाहे
पुत्रास त्या 'बळीच्या' वाढाल काय काही ?

पात्रामध्ये नदीच्या प्रेते सडून गेली
पाण्यास मार्ग आता दावाल काय काही ?

येतील दिवस तेही नांदू पुन्हा सुखाने
आशा चुकार  वेडी रुजवाल काय काही ?

© विशाल कुलकर्णी

Wednesday, March 1, 2017

परछाइयाँ


पैरों के छाले खुरचती धूप,
अपनी ही धुन में मगन..
परछाइयों से पूछती रही,
"अब हाल कैसा है?"
हम रह रह कर मुस्कुरातें रहे
अपनी ही परछाई की
अजीब सी उलझने बटोरतें रहे!

ग़म में रोने और ख़ुशी में हँसने की
सहूलियत हासिल है हमें!
परछाइयाँ...
पता नहीं क्यूँ ज़िन्दगी भर
ढोती रहती है बोझ
किसी और की किस्मत
और परायी उम्मीदों का..
जैसे बरगद के पेड़ से लिपटी बेलें
बस नाम की ज़िन्दगी...
जो टिकी हुई है किसी और की साँसों पर!

इंतज़ार है, तो उस दिन का..
जब मेरी परछाई हँस के कहेगी,
"तुम आगे चलो, मेरा इरादा..
थोड़ी देर और आराम करने का है!"
© विशाल विजय कुलकर्णी

Thursday, December 22, 2016

चाय की प्याली ...


ठिठुरती हुयी धुप ...
कोहरे की चादर ओढ़े,
घंटों हमसे बाते करती रहीं !
कुछ शिकवे, कुछ शिकायत
सर्दी के आलम को कोसती रही !

अतीत की नर्म यादोंके,
गर्म अलावपें हात सेकते हुए..
हम मुस्कराते रहें..., यूँही !

आँखों के सामने मंडराते रहें
हवाओं से अटखेलियां करते,
लहलहाते बाजरे के खेत
बाजरे के भूट्टोसे जुझते,
चहचहाते चिड़ियोंके झुण्ड
सर्दी की चादर ओढ़े हुए,
खेतों की नहरोमे बहता पानी !

चूल्हे के ऊपर रक्खे बर्तनसे आती,
अम्माके हाथकी बनी ...
बगैर दुध के चाय की भिनी सी खुशबू !

'बाबूजी चाय ले लो , गरमागरम अद्रक मारके'
ठेलेवाले छोकरेने प्यारसे..
हाथ में चाय की प्याली थमायी,
हंसकर बोला...
"कहाँ खो गए थे साब? कबसे पुकार रहा हूँ!"
हम बस मुसकुरा दिए... यूँही
आँखे ढूंढती रही ....
शहरकी भीडभाडमें खोएं हुए
लहलहाते वे बाजारें के खेत ,
और ढूंढते रहें..
उस चाय की प्यालीमें अम्माके हाथोंकी खुशबू !

© विशाल कुलकर्णी (२३-१२-२०१४)