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Wednesday, April 27, 2022

वो आयेगी ... जरूर !

 

पश्चिम की तरफसे आती

गर्म हवा की नर्म थपेड़े

बार-बार बंद खिड़कियों पर

दस्तक देती रही...

जैसे पूछती हों,

वो आयी ... ,? के नहीं ?


खिडकीसे सटी मेज के किनारे

मैं चुपचाप बैठा रहा...

बैठा रहा !

कुछ कह न सका तो

यूँ ही बडबडाता रहा...

जैसे खुदही को आश्वस्त करता रहा

वो आयेगी... आयेगी वो !


आयेगी, आज नही तो कल

मिट्टी की वो सौंधी सी खुशबू

पंछी फिरसे गायेंगे 

तराने खुशियों भरे

व्याकुल हो उठेगी धरा

मिलन को गगनके

और पुकारेगी बांछे खोलके

नदिया सुखी हुई..

गाने लगेंगे झरने, धरती की..

व्याकुलता संजोकर

वो आयेगी जरूर..!


फिर निकलूंगा मैं भी...

अपना छाता लेकर

वो मुझपे हँसेगी और...

मैं छुपा लूंगा 

अपना छाता किसी तरह,

हँसते हँसते बरसने लगेंगे मोती

उसकी बूंदों को छूकर, अपने भिगे हुए 

बालोंको संभालता हूवा

मैं भी हँस दूंगा खुद पर

फिर कहूँगा उन हवाओं से

देखो...

वो आ गयी ! 


© विशाल कुलकर्णी 

तिनोळी - हिंदी

कभी जिंदगी से पूछ कर देखो

मौत के मायने ...

मौत से बगैर जिंदगी, जिंदगी नहीं होतीं!

************

ऐ जिंदगी, 

कुछ देर तो ठहर..

मै भी, अपनी जिंदगी जी लू |

************



विशाल उवाच...

Tuesday, April 12, 2022

इल्तिज़ा

 कुछ पन्ने, अधखुले...

भूली बिसरी यादोंके

हमने लौटाये थे 

अपनी ही

ख़स्ता-हाल जिन्दगी को

के सहेजकर रखना

हो सके तो ..

हो सकता है 

बुढापे में काम आ जाएं !


विशाल उवाच...


गुमसुम

घाटी के किसी..,

अनजान हिस्से में

जुगनुओ के मेले 

ठंडे पडे है

जहाँ जमघट लगते थे

पंछीयों के...

वहां, बिलकुल वहीं..

ढलान के किसी मोड पर

सन्नाटे के आगोश में

सदियो से एक चाँद,

गुमसुम सा बैठा है l

कहतें है..

आजकल उसकी,

रात के निगेहबानोंसे

कुछ खास बनती नहीं 

जबसे...

चाँदनी उससे रूठी हुयी है |


विशाल कुलकर्णी

Thursday, September 17, 2020

गर मुहब्बत न होती आपसे !

 क्यां करते गर मुहब्बत न होती आपसे

तरसते हुस्न की तारीफ को आपके...

                  गर मुहब्बत न होती आपसे !


न ढाया करो जुल्म इतना भी सनम हमपर

तड़प उठती सैकड़ो कश्मकशे यूंही

                 गर मुहब्बत न होती आपसे !


जान लेती है महक आपके खुले बालोंकी 

कसक दिल की दबा देते दिलही में 

                  गर मुहब्बत न होती आपसे !


इक बार मुसकुरा दो , चाहे होटोमेंही हो

यूँही कत्ल हो जाएंगे तीर-ए-नजरसे

                     

बस्स मुहब्बत जो है आपसे !


विशाल ... 

Tuesday, December 10, 2019

शहर ...

शहर...

आजकल यूँ ही
सुलगता रहता हैं
अंदर ही अंदर ...
उबलता रहता हैं
ये शहर न जाने अपने अंदर
कौन सा ज्वार समेटे रहता हैं?

ख़ामोशी का
पैराहन ओढें
अंदर ही अंदर
सिसकता रहता हैं
अनगिनत बस्तियाँ अलाव की
खुद में ही संजोये रहता है

ये शहर बड़ा
बेतरतीब है
यहाँ अखबारों में
गर्म लहु भी बहता है
इन्सान यहाँ पर मुर्दा और
शमशानों में जमघट लगता है

चारो तरफ छाये
उदासियोंके गहरे साये
हर निगाह में शक
नफरत से भरे गलियारे
कोहरे की चादर ओढे
ये शहर बेगाना लगता हैं

© विशाल कुलकर्णी

Wednesday, May 15, 2019

धूप-छाँव



काफ़िलोंमें
बटी हुयी धूप
हर कदमपर छाँवसें
दो हाथ करती रहीं
अपनी जीत पें गर्वित
छाँव को मुँह चिढ़ाती रहीं
अपनी जीत में
मशगूल, उसे पता हीं न चला
के छाँव तो कभी
उससे लड़ी ही नहीं
वो तो अपनी ही धुन में मस्त,
राहगीरोंको ...
शीतलता देनें में व्यग्र थी !

© विशाल कुलकर्णी

Thursday, April 26, 2018

आवाज़ें...



कहीं पँछीयों की किलकिल
कहीं झरनों की कलकल
कहीं पेड़ों की शाखों से
गुज़रती हवाओं के मद्धम झोंके
फूलों के इर्दगिर्द वो..
मधुमख्खियों का मँडराना

आसमाँ से बाते करती
शानदार घमंडी इमारतें
टूटी हुई दिवारों से गुज़रती
हवाओं से बतियाती झुग्गियाँ
गाड़ियों के पीछे दौडते
कुत्तों का भौंकना
किसी घर की अटरिया पे
बिल्लियों का खिसियाना
कभी सड़क से गुज़रती ...
गाडीयों की सरसराहट
तो कभी रेल की पटरीयों पे
पहियों की वो पुरज़ोर चरमराहट

ट्रेन की आवाज़ में लिपटी
अनगिनत सवारियों की आवाज़ें
किसी मोबाईल की रिंगटोन
किसी आशिक़ की महबूब से
हलकी सी खुसफुसाहट
ट्रेन की भीड़ में खड़ी
अपनी बच्ची से फोन पे बतियाती कोई माँ

आवाज़ें
हर तरफ़ से आती हुई
आवाज़े...
हर तरफ जाती हुई
आवाज़ों की आवाज़
तो काफी सुनी थी मैं ने भी
तुमने हमेशा के लिए अलविदा क्या कह दिया
तब जा के अहसास हुआ ...

ख़ामोशियों की आवाज़ काफी बुलंद हुआ करती है !

© विशाल विजय कुलकर्णी

Thursday, February 8, 2018

ओस की बूंदे


वो लहराते हुए जंगल..
वो अपनी ही धुन में,
गाते, किलकिलाते पंछी,
वो हँसते खेलते पेडों के साये !

वो खिलखिलाती ...
झूमती नदियाँ के किनारे ,
हाँ ...,
नदियाँ के किनारे...
सदियोसे खडे , 
बरगद की जटाओं से लिपटी,
घास किं पत्तीयों से
खेलती, अटखेलिया करती
मासूम ओस की अल्हड़ बूंदे ।

कभी की हैं बाते,
ओस की नर्म बूंदों से?
बड़ी शरीर होती है
ये ओस कि बूंदे ...
छूने जाओ तो यूं फिसलती है
जैसे किसी शोख की बदमाश नजरे
दिमाग कहता है ... दूर रह
कंबख्त दिल हैं
के मानता हीं नहीं।

फिर सरसराती हवा का एक झोका,
ओस की बूंदो को...
जकड़ कर रखने की ...
घास की पत्तीयों की वो भरसक कोशिशें
और फिर अमूमन...
उनका जान जाना ,
कीं, ओस की बूंदे कभी हात नहीं आती !

© विशाल कुलकर्णी

Wednesday, September 27, 2017

ढोंग

काही दिवसांपूर्वी एका ठिकाणी झालेली जंगलतोड़ बघून अस्वस्थ अवस्थेत काही ओळी खरडल्या होत्या.

रात के वक्त जब सारी दुनियाँ,
खर्राटों के आलम में डूब जाती है !
मैं अक्सर जागता रहता हूँ,
सोने नही देती भुलेसे भी...
कराहते दरख्तोंकी खामोश सिसकियाँ..
मैं खिडकी से बाहर झाँकता हूँ ...
महसूस करनेकी कोशिश करता हूँ,
अधकटे पीपल के तनेसे रिसती,
हजारो अनकही दास्ताएँ !
पुकार-पुकारके दुहाइयाँ देती,
उससे लिपटी मजबूर बेले ...
मुझसे पूँछती है ,
क्यां सचमुच...,
हमारी कोई जरूरत नही है तुम्हें?
मैं कसमसा जाता हूँ...
चादर ओढ के फिरसे नींद का ढोंग रचाता हूँ !

© विशाल कुलकर्णी

Thursday, June 15, 2017

ख्वाब ... जो अभी देखें ही नही

छुईमुई सी रात
अँधेरेके आँचलमें
संजोकर रखती
सुबहा के ख्वाब
किसी मुलाकात में
हमने पूँछा उसका राज
हँसकर बोली...
मेरे गुदड़ी के लाल
कभी जब उजालों से डर लगे
तो आ जाना बेझिझक..
कुछ तुम्हें भी दूंगी
जो छुपाकर रख्खे है ख्वाब !

© विशाल

Wednesday, March 1, 2017

परछाइयाँ


पैरों के छाले खुरचती धूप,
अपनी ही धुन में मगन..
परछाइयों से पूछती रही,
"अब हाल कैसा है?"
हम रह रह कर मुस्कुरातें रहे
अपनी ही परछाई की
अजीब सी उलझने बटोरतें रहे!

ग़म में रोने और ख़ुशी में हँसने की
सहूलियत हासिल है हमें!
परछाइयाँ...
पता नहीं क्यूँ ज़िन्दगी भर
ढोती रहती है बोझ
किसी और की किस्मत
और परायी उम्मीदों का..
जैसे बरगद के पेड़ से लिपटी बेलें
बस नाम की ज़िन्दगी...
जो टिकी हुई है किसी और की साँसों पर!

इंतज़ार है, तो उस दिन का..
जब मेरी परछाई हँस के कहेगी,
"तुम आगे चलो, मेरा इरादा..
थोड़ी देर और आराम करने का है!"
© विशाल विजय कुलकर्णी

Thursday, December 22, 2016

चाय की प्याली ...


ठिठुरती हुयी धुप ...
कोहरे की चादर ओढ़े,
घंटों हमसे बाते करती रहीं !
कुछ शिकवे, कुछ शिकायत
सर्दी के आलम को कोसती रही !

अतीत की नर्म यादोंके,
गर्म अलावपें हात सेकते हुए..
हम मुस्कराते रहें..., यूँही !

आँखों के सामने मंडराते रहें
हवाओं से अटखेलियां करते,
लहलहाते बाजरे के खेत
बाजरे के भूट्टोसे जुझते,
चहचहाते चिड़ियोंके झुण्ड
सर्दी की चादर ओढ़े हुए,
खेतों की नहरोमे बहता पानी !

चूल्हे के ऊपर रक्खे बर्तनसे आती,
अम्माके हाथकी बनी ...
बगैर दुध के चाय की भिनी सी खुशबू !

'बाबूजी चाय ले लो , गरमागरम अद्रक मारके'
ठेलेवाले छोकरेने प्यारसे..
हाथ में चाय की प्याली थमायी,
हंसकर बोला...
"कहाँ खो गए थे साब? कबसे पुकार रहा हूँ!"
हम बस मुसकुरा दिए... यूँही
आँखे ढूंढती रही ....
शहरकी भीडभाडमें खोएं हुए
लहलहाते वे बाजारें के खेत ,
और ढूंढते रहें..
उस चाय की प्यालीमें अम्माके हाथोंकी खुशबू !

© विशाल कुलकर्णी (२३-१२-२०१४)

Thursday, December 8, 2016

आदतन



सडक के किनारे बिखरी
अलाव कीं अनगिनत बस्तियां !
अक्सर याद दिलाती हैं,
जिंदगी के सफरमें पिछे छुटे
कुछ जलते हुए जख्म ...
याद आते है वे मंज़र
अपनीही आहोंसे
लहुलूहान वे खंजर...
जो धसें थे सिने में जजबात बनकर
और फिर छाये..;
उदासीयोंके कोहरे मे,
हम ढुंढते रह गए ,
गर्म सांसो की नर्म चिंगारीयां !
जो आहत करती रही,
अपनेही वजूद कों..., आदतन !
हम .....
आज भी ढुंढते हैं,
अतीत कीं धुंध में लिपटे ...
मासुम और तनहां साये,
जिन्हे दुनिया अहसास कहा करती हैं,
युंही...., आदतन !

विशाल
९-१२-२०१६

Sunday, September 18, 2016

आज का अखबार ...!



वैसे तो अखबार...
काफी साफ सुथरा 'दिखता' है रोज
श्वेत रंग में लिपटे कृष्णवर्णी हर्फ
अच्छे लगते है आँखोको.. !

आज का अखबार सुर्ख था...
अब कुछ दिनो तक
ये सुर्ख रंग सुरखींयोमे रहेगा
खबरोकें बाजार गरम होंगे
बहस चलेगी चौराहोंपें
न्याय-अन्याय के ठेकेदार चर्चा में रहेंगे
इस्तीफे मांगे जाएंगे
सतरा के बदले एकसो सत्तर के नारे लगेंगे
कश्मीर हो या पंजाब...
या फिर मेरी अनजान गलीका
कोई सुनसान कोना ,
हम उंगलिया उठायेंगे जरूर
एक दुसरें पर...
सांसदोमें बहस होगी
नीतीमत्ता के मुद्दे उठेंगे
फिर दोपहर के सत्र में
चाय के साथ बिस्कुट बनाके खायें जाएंगे
...
....
रास्तो पर उठती धुल
आहिस्ता-आहिस्ता बैठ जायेगी
सत्रह घर धीरे धीरे
अपने दिलोमें उठती
असहनिय टिसको सहेजना सिख ही लेंगे
और हम... ?
हम फिर इंतजार करेंगे
किसी और सुर्ख अखबार का !

विशाल कुलकर्णी
१९-०९-२०१६

Wednesday, August 17, 2016

गंगा के तटपर ....

गंगाके तटपर खडा हतप्रभ
स्तब्ध देवसा शख्स कोई
श्यामल रातसी काया उस की
आँखो में उलझन अजबसी

ये कौनसी जगह है ...
क्यां ये वही धरा है ?
शिवजी के मस्तकसें उपजी
क्या ये वही धारा है ?

लहरोंमे डोल रहे शव, और...
तट पर हाट पंडितोंका (?)
ये तेरा, ये मेरा, क्षुब्ध कलह
खुब सजाते, ढोंग भक्तीका

इनसे तो फिर भी अच्छा हूं मैं
छल, अधम हूं..., सच्चा हुं मैं
ये मानव मानवता को छलते
इनसे तो थोडा कच्चा हूं मैं

सोच रहा वो 'देव'* पस्तसा
क्या इसी लिये मैं काशी आया?
देख तमाशा ढोंगी भक्तोका
'पाप' भी वहा खुद्द शरमाया

(* देव हा शब्द ( बहुदा फारसी किंवा असीरीयन संदर्भ ) उंचापुरा धिप्पाड या अर्थाने वापरला आहे, ईश्वर या अर्थाने नाही)

विशाल ...

Tuesday, May 24, 2016

पता

पता

वो सांझ,
वो अंधेरोंके साये
काली मिट्टी और ...
सुखे की आगोशमें सिमटे हुए
दूर दूर तक फैले
अपने आपमें तनहां खेत
आसमांसे बाते करते सुखे पेड
और उनकी ....
बातोंमें उलझी खामोशीयाँ
अक्सर पुंछती रहती है
गुजरती हुई हवाओंसे
रुठी हुई बारिशका पता
मैं भी दुआ करता हुँ बार-बार
के मिल जाए उन्हें
खुशनुमा उस बारिश की खबर
तांकि मैं भी जा सकू फिरसे,
फिर उस जगह  ...
और एक बार फिरसे..., कसके
भींच लू अपनी बाहोंमे
मेरे हँसीन बचपनको
जो खोया था वही,
जहां , जब ...
बारिशको भी मालूम हुवा करता था
उसके इंतजार में तरसते खेतोंका पता !

विशाल
१-४-२०१६




गुलझार

कभी कभी?
हर मुस्कराहटमें मिलता है गुलजार
हर आँसू में हंसता है गुलजार
सडक के किनारे खडे..
हर पीपलसे पुछो
उसकी सुखी शाखोंसें
पुकारता है गुलजार
सिग्नलपे गुलाबके फुल बेचती किसी मासुमको देखो
उसकी चमकती आंखोमे
नजर आता है गुलजार
अक्सर देखा है मैंने आईनेको
मेरी सुरतपें हंसते हुए
उसकी हंसीमें छुपा
मेरे अंदर झांकता रहता है गुलजार
हर वो सांस जो रुक जाती है
कश्मकशमें जिंदगीकीं
कभी दिलकी नजरसे देखो
वहा डेरा डाले रहता है गुलजार
जहां रुक जाती है सोंच मेरी
वहीसे आगे का...
रास्ता दिखाता है गुलजार !

विशाल

Sunday, November 1, 2015

इंतज़ार - 2


**********************************************

उस पीपल के पेड के तले
बहुत सी तनहाईयाँ रहती हैं
अपनी ही...
खामोशीयोंमें सिमटी हुयी
एक चाँद आजकल
पीपल केँ...
चक्कर काटते देखा है मैं ने
कुछ मायूस, कुछ तनहा-तनहा
खोया-खोयासा रहता हैं
जैसे निकला हो...
किसी की तलाश में
कसमसा के रह जाता है पीपल
कुछ बोल नही पाता
पर बहुत कुछ बोलती हैं
पत्तीयों में उलझी खामोशियाँ
जैसे महसूस कर रही हो
उस खामोश दर्द कों
मैं जानता हूँ ...
चाँद चुप्पी नही खोलेगा
किसी ना किसी दिन मुलाक़ात होगी
उस की चांदनी से...
पुछूँगा नही मैं हाल-ए-बेकरार
कभी तो रोशनी का मंजर होगा
उजालों से मुलाकात होगी
मैं इंतज़ार करुंगा
उस मुस्कुराहट का !

*********************************************************
विशाल...

Monday, October 19, 2015

'इंतज़ार'

********************************************

पूरे चाँद की उस रात 
रात कुछ सहमी सी,
ठिठूरते हुए चाँद की 
काँपती हुई ...
ज़ुल्फ़ों से रिसता पानी
दिल कर रहा था ,
चुम लूँ उन बूँदों को
हलके से ...
रोक दूँ हवाओं के झोंके
महसूस कर लूँ
शर्मीली, झुकी निगाहों को
छू लूँ एक बार 
फ़िज़ाओं में बिखरी हुई
उन नर्म मुस्कराहटों को
कई बार चाहा 
घास के पत्तों पे उलझी
ओस की नर्म बूँदों से पूछूँ..,
उन गर्म साँसों का पता !
नहीं पूछ पाया...
सवाल उलझे रहें 
मेरी खामोश तनहाईयों में
चाँद भी तो ..
सदियों से खामोश है 
जानता तो वो भी है मुझको
...
...
पर शायद ...
उसे भी 'इंतज़ार' है !

विशाल